बांसवाड़ा में दक्षिण राजस्थान का एक आदिवासी क्षेत्र, सदियों पुरानी परंपरा के तहत, पीले (हल्दी से रंगे हुए) और लाल (कुमकुम से रंगे) चावल के दानों को लोगों को आमंत्रित करने के लिए दहलीज पर रखा जाता है। नोतरा परंपरा की सबसे बड़ी बात यह है कि आप जितना पैसा देता है उससे अधिक आपको पैसा मिलता है अर्थात के आपने यदि किसी के नोतरा में ₹500 दिए हैं तो जब भी आपके घर पर नोतरा पड़ेगा तो जिसको आपने ₹500 दिए थे वह आपको उसके अंदर अधिक पैसे मिलाकर के देगा इससे सबसे बड़ी बात यह है कि किसी की आर्थिक स्थिति कमजोर हो और वह लोग परंपरा के अंतर्गत आए पैसे से अपनी आम जरूरतों को पूरा कर सकता है और उसको वह पैसे बिना ब्याज के लोगों को वापस कर सकता है क्योंकि सभी के नोतरा एक साथ नहीं पड़ता है धीरे-धीरे पड़ता है और जिससे उसका कर्जा आसानी से उतर सकता हैवागड़ी बोली में नोतरा कहे जाने वाले इस आमंत्रण में चावल के दोनों रंगों के अलग-अलग अर्थ हैं। दहलीज पर पहुंचे चावल के रंग को देखकर संबंधित परिवार समझ जाता है कि इसे क्यों न्यौता दिया गया है। इसके बाद वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक उपहार देता है। शादी समारोह में निमंत्रण के लिए पीले चावल रिश्तेदारों और परिचितों की दहलीज पर रखे जाते हैं, जबकि लाल चावल घरों की दहलीज पर वांगड़ा नोटरा यानी आर्थिक जरूरत, जमीन खरीदने, गृह निर्माण, गृह प्रवेश, बीमारी और अन्य कारणों से रखे जाते हैं। रखे गए हैं।
सामाजिक सरोकार और आपसी सहयोग की नोट्रा प्रथा पीढ़ियों से चली आ रही है। इस प्रथा में समाज में विवाह, विशेष अवसरों एवं आवश्यकताओं पर होने वाले व्यय की पूर्ति सहयोग से की जाती है। सामाजिक स्तर पर चली आ रही इस प्रथा का उपयोग पिछले वर्षों में शिक्षण संस्थानों में भौतिक सुविधाओं के विस्तार के लिए धन संग्रह करने के लिए भी किया जाता रहा है। गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय के माध्यम से इस प्रथा पर काम करने की योजना बनाई गई है। कहीं-कहीं निमंत्रण पत्र छपे हैं और सोशल मीडिया पर भी निमंत्रण दिए गए हैं।

