हर घर तिरंगा… और बच्चों के पैरों में नंगेपन की ठंडी चुभन
देश इन दिनों तिरंगे के रंग में रंगा हुआ है। हर गली, हर मोहल्ला, हर घर में तिरंगा लहराने का सरकारी मिशन ज़ोरों पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कभी लाखों रुपये का सूट पहनकर चमकते हैं, कभी गंगा सफाई का ‘महाअभियान’ चलाकर हेडलाइन बनाते हैं। पर इन तमाम बड़े-बड़े नारों और पोस्टरों के बीच, जमीनी सच्चाई की तस्वीर कहीं और कहानी सुना रही है।
ज़रा तस्वीर देखिए—एक ओर स्कूल के बच्चे हाथों में तिरंगा लहरा रहे हैं, राष्ट्रीय गीतों की गूंज है, चेहरे पर देशभक्ति का जोश है। पर पैरों की तरफ नज़र डालते ही दिल बैठ जाता है—कई बच्चों के पैरों में चप्पल तक नहीं। बारिश से भीगी सड़क, कंकड़-पत्थरों वाली गलियां, और उन्हीं पर नंगे पांव बच्चों की परेड।
सरकारी आदेश के मुताबिक, हर स्कूल को बच्चों और शिक्षकों के साथ ‘हर घर तिरंगा’ अभियान का हिस्सा बनना है। पर सवाल यह है—क्या तिरंगे का सम्मान सिर्फ हाथ में झंडा थामने से होता है, या उस पीढ़ी को बुनियादी सुविधाएं देने से भी, जो कल इस देश का भविष्य बनने वाली है?
बच्चे नंगे पांव हैं, लेकिन झंडा लहराना ज़रूरी है, क्योंकि यह ‘अभियान’ है। यह वही देश है जहां करोड़ों का विज्ञापन बजट और लाखों के सूट के लिए फंड मौजूद है, पर चप्पल, किताब, साफ़ यूनिफॉर्म जैसी जरूरतों के लिए ‘अगली योजना’ का इंतजार है।
ये तस्वीरें कटाक्ष करती हैं—क्या देशभक्ति का पैमाना सिर्फ तिरंगे की ऊंचाई है, या फिर उस ऊंचाई तक पहुंचाने वाले बच्चों के सपनों को सच्चाई की ठोस ज़मीन देना भी है? क्योंकि, बिना चप्पल के, रास्ता लंबा और चुभन भरा होता है… चाहे हाथ में तिरंगा हो या नहीं।

