शिक्षा या आयोजन?

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सरकारी स्कूलों में बढ़ते कार्यक्रमों पर उठे सवाल
राजस्थान के सरकारी विद्यालयों में एक बार फिर नए आयोजन को लेकर निर्देश जारी हुए हैं। “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” के तहत स्कूलों में फिल्म प्रदर्शन, प्रश्नोत्तरी, रंगोली, संगीत और अन्य प्रतियोगिताएं कराने के आदेश दिए गए हैं। �
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लेकिन इन आदेशों के बाद शिक्षा जगत में एक नई बहस छिड़ गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या विद्यालय अब पढ़ाई के केंद्र कम और सरकारी आयोजनों के मंच ज्यादा बनते जा रहे हैं?
कटाक्ष करते हुए कई लोगों का कहना है कि पूर्ववर्ती सरकारों के समय भी विचारधाराएं थीं, योजनाएं थीं और अभियान भी चलते थे, लेकिन तब शिक्षा विभाग को इस तरह हर नए प्रयोग का माध्यम नहीं बनाया जाता था। अब हालात यह हैं कि स्कूलों में पढ़ाई से ज्यादा आयोजनों की चर्चा दिखाई देने लगी है।
शिक्षकों का कहना है कि पहले ही सरकारी विद्यालय शिक्षकों की कमी, गिरते शैक्षणिक स्तर और गैर-शैक्षणिक कार्यों के दबाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में लगातार नए कार्यक्रमों की जिम्मेदारी डालना शिक्षा व्यवस्था को और बोझिल बना रहा है। अभिभावकों के बीच भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा जरूरी अब सरकारी थीम आधारित आयोजन हो गए हैं?
जानकारों का मानना है कि शिक्षा विभाग का मूल उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना होना चाहिए, लेकिन लगातार हो रहे आयोजनों से ऐसा प्रतीत होने लगा है मानो स्कूलों को सामाजिक और राजनीतिक अभियानों की प्रयोगशाला बनाया जा रहा हो।
अब देखने वाली बात यह होगी कि शिक्षा विभाग इन सवालों को गंभीरता से लेता है या फिर आने वाले दिनों में विद्यालयों में इसी तरह नए-नए प्रयोग जारी रहेंगे।

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