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💧 “माही का पानी सरकार के इशारे पर, प्यासे रह गए बांसवाड़ा-डूंगरपुर के किसान!”
जयपुर/बांसवाड़ा।
राज्य सरकार ने माही का पानी जयसमंद और जवाई बांध तक ले जाने की योजना को लेकर 7,000 करोड़ रुपये की डीपीआर को मंजूरी दे दी है। परियोजना का उद्देश्य उदयपुर संभाग के कुछ हिस्सों को पेयजल और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना बताया जा रहा है। लेकिन इस योजना ने बांसवाड़ा व डूंगरपुर जैसे उन क्षेत्रों के किसानों के जख्म फिर से हरे कर दिए हैं, जहां वर्षों से नहरें तो बन गईं, लेकिन आज तक पानी नहीं पहुंच पाया।
इस योजना को लेकर कांग्रेस और कई सामाजिक संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। हाल ही में कांग्रेस ने बांसवाड़ा में युवाओं के नेतृत्व में जल सत्याग्रह शुरू किया। उनका कहना है कि सरकार बांसवाड़ा और डूंगरपुर के किसानों के साथ भेदभाव कर रही है। पहले से बनी नहरों में पानी देना तो दूर, अब सरकार माही का पानी उन इलाकों की ओर मोड़ रही है जहां इसकी तुरंत आवश्यकता नहीं है।
कमीशन की राजनीति या जनहित?
विपक्ष का आरोप है कि इस योजना के पीछे जल आपूर्ति से ज्यादा ठेकेदारी, कमीशनखोरी और राजनीतिक लाभ का खेल है। जहां पहले से बनी परियोजनाओं में पानी नहीं पहुंचाया गया, वहीं नई योजनाएं बनाकर करोड़ों रुपए स्वीकृत कर दिए गए। सच्चाई यह है कि बांसवाड़ा और डूंगरपुर के कई गांवों में किसान अब भी वर्षा जल पर निर्भर हैं।
सरकार की मंशा पर सवाल
मंत्री जोराराम ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर इस परियोजना की रिपोर्ट को मंजूरी दिलवाई। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार यदि वास्तव में किसानों की चिंता करती, तो पहले उन इलाकों में माही का पानी पहुंचाती जहां दशकों से सिंचाई के लिए संघर्ष हो रहा है।
जल सत्याग्रह की चेतावनी
कांग्रेस नेताओं ने चालू कर दी है कि यदि सरकार ने जनहित की उपेक्षा करते हुए केवल अपने चहेते इलाकों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की, तो व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा। युवाओं द्वारा जल सत्याग्रह की शुरुआत इसी दिशा में पहला कदम है।
निष्कर्ष:
सरकार द्वारा जयसमंद और जवाई बांध तक माही का पानी पहुंचाने की योजना चाहे जितनी आकर्षक दिखे, लेकिन जब तक माही परियोजना के मूल लाभार्थी – बांसवाड़ा और डूंगरपुर – के किसानों को इसका वास्तविक लाभ नहीं मिलता, तब तक यह योजना केवल एक और ‘मुंगेरीलाल का सपना’ ही कहलाएगी।

