विशेष कॉलम** बलिदान दिवस या भोज समारोह? ✍️ *लेखक: [पूर्णानंद पाण्डेय]
हर साल 23 जून को हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस को एक प्रेरणास्रोत के रूप में मनाते आए हैं। यह दिन भारत की एकता और अखंडता के लिए किए गए एक महान आत्म-समर्पण की याद दिलाता है। लेकिन इस वर्ष बांसवाड़ा भाजपा कार्यालय में इस दिन जो आयोजन हुआ, उसने कुछ नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
कार्यक्रम में श्रद्धांजलि दी गई, वक्ताओं ने अपने विचार रखे, कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का सार्वजनिक सम्मान किया गया – यहां तक तो सब कुछ सामान्य और गरिमामय था। लेकिन फिर दृश्य बदला। कार्यक्रम के बाद बाहर खुले में पंक्तिबद्ध होकर भोजन करते कार्यकर्ताओं की तस्वीरें सामने आईं। जिला अध्यक्ष श्री पूंजीलाल गायरी सहित अन्य पदाधिकारी “स्नेह भोज” का आनंद ले रहे थे।
अब सवाल यह उठता है — क्या बलिदान दिवस जैसे दिन पर भोज उचित है? क्या यह एक नई राजनीतिक परंपरा की शुरुआत है जिसे “मृत्यु भोज” का वैचारिक चोला पहनाया जा रहा है? या फिर यह उस विचारधारा से विचलन है, जिसकी बुनियाद बलिदान, त्याग और साधना पर टिकी है?
बलिदान दिवस केवल स्मरण का दिन नहीं होता, यह आत्ममंथन का अवसर होता है। यह वो दिन है जब हम मौन रहकर अपने भीतर झांकते हैं, और स्वयं से पूछते हैं — क्या हम उनके दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं?
भोज की थाली में श्रद्धांजलि की गरिमा डूबती है इस आयोजन ने राजनीतिक शो-ऑफ, आत्मप्रचार और फोटोजेनिक राजनीति के उस चेहरे को सामने ला दिया है जो अब धीरे-धीरे हमारी राजनीतिक संस्कृति को संक्रमित कर रहा है। जहां श्रद्धांजलि से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि कैमरे में कौन मुस्कुरा रहा है, कौन कितनी थाली लेकर बैठा है, और किसने सोशल मीडिया स्टेटस सबसे पहले डाला।
डॉ. मुखर्जी के नाम पर यह कैसा प्रेरणा स्रोत? डॉ. मुखर्जी का जीवन तपस्या और राष्ट्रभक्ति का परिचायक था। क्या हम उनके नाम पर इतना भी संयम नहीं रख सकते कि कम-से-कम बलिदान दिवस को बाज़ारवाद और पाखंड से दूर रखें?
राजनीतिक नेतृत्व को करनी होगी आत्मचिंतन की शुरुआत यदि भाजपा जैसे अनुशासनप्रिय संगठन के भीतर भी ऐसे आयोजन बिना रोक-टोक के होने लगें, तो यह पार्टी की वैचारिक पहचान के लिए खतरे की घंटी है। नेतृत्व को चाहिए कि ऐसे आयोजनों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे, जिससे बलिदान दिवस की मर्यादा अक्षुण्ण बनी रहे।
अंत में बलिदान दिवस भोज दिवस नहीं है। बलिदान दिवस समारोह नहीं, संकल्प का दिन है। बलिदान दिवस भोजन के आनंद का नहीं, विचारों की तपस्या का दिन है।
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