सम्मान या सवाल? शिक्षक दिवस पर बांसवाड़ा से उठी गड़बड़ी की गूंज
विचार।
5 सितंबर का दिन शिक्षकों के सम्मान का दिन माना जाता है। यह अवसर उन शिक्षकों को प्रेरित करने का होता है जिन्होंने अपने परिश्रम और नवाचार से शिक्षा को नई दिशा दी हो। लेकिन बांसवाड़ा से इस बार जो खबर सामने आई है, उसने पूरे सम्मान समारोह की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गड़बड़ी का गणित
शिक्षिका सोनाली जोशी का नाम राज्य स्तरीय सम्मान सूची में आया। लेकिन जांच में सामने आया कि उन्होंने—
2003 की एम.ए. हिंदी की मार्कशीट (419/800 = 52%) लगाई और उसे ऐसे पेश किया जैसे वह 60% से अधिक हो।
विभागीय नियम साफ कहता है कि केवल 60% से 75% अंकों पर 0.5 अंक मिलते हैं, फिर भी इस मार्कशीट से अंक जोड़ दिए गए।
2013 की अंग्रेजी की मार्कशीट भी लगाकर फिर से 0.5 अंक हासिल कर लिए।
यानी एक ही डिग्री से दो बार लाभ उठाया गया और गलत प्रतिशत को सही दिखाकर नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं।
इतना ही नहीं, 20 लाख रुपये के सामूहिक फंड को व्यक्तिगत योगदान बताकर अंक लेना भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्रशासन पर आरोप क्यों?
पूरे मामले की जिम्मेदारी जिला शिक्षा अधिकारी जयदीप पुरोहित पर थी। उनके पास यह अधिकार और जिम्मेदारी थी कि वे—
दस्तावेजों की जांच करें,
प्रतिशत और अंक सही परखें,
और समिति के समक्ष निष्पक्ष रिपोर्ट रखें।
लेकिन यहाँ आरोप यह है कि पुरोहित ने सबकुछ जानते-बूझते आंखें मूंद लीं। पहले तेजपुर प्रकरण में भी इनकी कार्यशैली पर सवाल उठे थे और अब यह नया मामला सामने है। सवाल उठता है—
👉 क्या यह लापरवाही है या जानबूझकर किया गया चहेतावाद?
सम्मान पर धब्बा
यह सम्मान केवल किसी एक शिक्षक का मुद्दा नहीं है। यह उन हजारों ईमानदार शिक्षकों की मेहनत का अपमान है जो दिन-रात काम करके भी कभी ऐसे पुरस्कार तक नहीं पहुँच पाते। अगर गड़बड़ी से सम्मान मिलेंगे तो—
मेहनती शिक्षक हतोत्साहित होंगे,
विभाग की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगेगा,
और समाज में यह संदेश जाएगा कि “यहाँ भी वही सफल है जिसके पास पहुंच और पैसे हैं।”
जरूरी है निष्पक्ष जांच
अब समय आ गया है कि विभाग इन आरोपों को सिर्फ कागजों पर दबाने की बजाय निष्पक्ष जांच कराए। यदि दोषी पाए जाएं तो—
सम्मान वापस लिया जाए,
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो,
और भविष्य में चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए कड़े प्रावधान किए जाएं।
निष्कर्ष
शिक्षक दिवस का सम्मान सिर्फ एक पुरस्कार नहीं है, यह पूरे समाज का विश्वास है। इस विश्वास को बनाए रखना शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है। और अगर यह जिम्मेदारी भी लीपा–पोती और पक्षपात की भेंट चढ़ेगी, तो आने वाले समय में यह सम्मान केवल औपचारिकता और खिल्ली बनकर रह जाएगा।
पहुंच और पैसे के आगे बेबस व्यवस्था, ईमानदार शिक्षक कहाँ जाएं?”
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