धर्म, कानून और चयनित मौन: क्या हर बार हिंदू ही अपमानित होता रहेगा?

pnpandey

हिंदू परिषद, दुर्गा वाहिनी, आरएसएस जैसे संगठन जब भी सत्ता के विपरीत कोई विषय होता है, तब अचानक अत्यंत सक्रिय हो जाते हैं। नारे, प्रदर्शन, बयान और चेतावनियाँ—सब कुछ दिखाई देता है। लेकिन हाल ही में शंकराचार्य से जुड़ी गंभीर घटना पर वही संगठन असहज चुप्पी ओढ़े हुए हैं। यह मौन साधारण नहीं, बल्कि सोचा-समझा हुआ प्रतीत होता है। सवाल सीधा है—क्या आस्था भी अब राजनीतिक सहूलियत के तराजू पर तौली जाएगी?
शंकराचार्य किसी एक समुदाय के नेता नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की वैचारिक रीढ़ हैं। उनके साथ हुई घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि उस परंपरा पर प्रहार है जिसे भारत की आत्मा कहा जाता है। इसके बावजूद तथाकथित धर्म-रक्षक संगठनों की चुप्पी यह संकेत देती है कि विरोध अब धर्म के लिए नहीं, बल्कि सत्ता-समीकरण के लिए होता है।
इसी पृष्ठभूमि में UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। समानता और भेदभाव-निरोध के नाम पर लाए गए इन नियमों का उद्देश्य काग़ज़ों में भले ही न्यायपूर्ण दिखे, लेकिन जमीनी आशंका यह है कि इनके दुरुपयोग की गुंजाइश कहीं ज़्यादा है।
UGC नियम 2026 के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई, आंतरिक समितियाँ, दंडात्मक प्रावधान और संस्थानों पर सीधी जवाबदेही तय की गई है। सवाल यह नहीं कि भेदभाव रोका जाए या नहीं—वह तो आवश्यक है। सवाल यह है कि क्या आरोप ही सज़ा बन जाएगा?
क्या किसी शिक्षक, अधिकारी या छात्र को केवल शिकायत के आधार पर कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा? और यदि ऐसा हुआ, तो क्या उसका सबसे आसान निशाना वही वर्ग बनेगा जो पहले से ही “बहुसंख्यक” होने के कारण असुरक्षित माना जाने लगा है?
आज एक तरफ शंकराचार्य जैसी धार्मिक संस्था पर आघात होता है और दूसरी तरफ ऐसे नियम लागू होते हैं, जिनके नाम पर वैचारिक असहमति को भी “भेदभाव” का लेबल लगाकर दबाया जा सकता है। इन दोनों घटनाओं के बीच जो कड़ी दिखाई देती है, वह है—चयनित आक्रोश और सुविधाजनक मौन।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या हर बार हिंदू परंपरा, हिंदू विचार और हिंदू पहचान ही सफ़ाई देती रहेगी?
क्या धर्म-रक्षा केवल तब होगी, जब वह राजनीतिक लाभ दे?
और जब आस्था पर चोट पड़े, तब सबके मुँह पर ताले क्यों लग जाते हैं?
यदि समाज को सच में समानता चाहिए, तो कानून निष्पक्ष हों, आवाज़ें ईमानदार हों और विरोध चयनित न हो। वरना इतिहास यही लिखेगा कि धर्म नहीं बदला—धर्म के ठेकेदार बदल गए।

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