तिलक की राजनीति, स्वाभिमान की परीक्षा! संत बोले ‘स्वाभिमानी’, जनता पूछ रही—तो दल-दर-दल क्यों?

pnpandey

राम, पद और सत्ता के बीच उलझी मालवीय की सियासी कहानी
बांसवाड़ा/वागड़।
वडेश्वर धाम के पीठाधीश संत अच्युतानंद महाराज के मंच से दिए गए बयान ने मालवा–वागड़ की राजनीति में भूचाल ला दिया है। यह बयान अब केवल धर्म या आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय की पूरी राजनीतिक यात्रा को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है।
संत अच्युतानंद महाराज ने स्पष्ट शब्दों में कहा—
“तिलक लगाने, दुपट्टा ओढ़ लेने से कोई हिंदू नहीं बन जाता। जिसमें दया, धर्म और करुणा हो, वही हिंदू कहलाता है।”
इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित नेता “स्वाभिमानी आदमी” हैं।
यहीं से सियासत का असली सवाल शुरू होता है।
❓ अगर स्वाभिमानी थे, तो दल-दर-दल क्यों?
राजनीतिक गलियारों में अब खुलकर यह सवाल उठ रहा है कि यदि महेंद्रजीत सिंह मालवीय वास्तव में स्वाभिमानी थे, तो उन्होंने
पहले कांग्रेस छोड़ी,
फिर भाजपा जॉइन की,
और 23 माह तक अपेक्षित पद नहीं मिलने पर दोबारा कांग्रेस की ओर रुख क्यों किया?
जनचर्चा साफ कह रही है कि यह स्वाभिमान नहीं, बल्कि पद की प्रतीक्षा और सत्ता की बेचैनी थी, जिसने राजनीतिक दिशा बदली।
🚩 राम का नाम और राजनीति का यू-टर्न
जब मालवीय जी कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे, तब उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा था—
“मैं कांग्रेस इसलिए छोड़ रहा हूं क्योंकि यह पार्टी राम को नहीं मानती।”
अब वही नेता कांग्रेस में वापसी की कोशिश कर रहे हैं।
तो सवाल स्वाभाविक है—
क्या अब कांग्रेस राम को मानने लगी है?
या फिर राम अब सिर्फ राजनीतिक ज़रूरत भर रह गए हैं?
राजनीतिक विश्लेषक तीखा सवाल पूछ रहे हैं—
यदि उस समय कांग्रेस ‘राम विरोधी’ थी, तो आज संतों के सहारे उसी कांग्रेस में प्रवेश क्यों?
🧘 संतों का सहारा या राजनीतिक कवच?
यह भी चर्चा में है कि कांग्रेस ने अभी तक महेंद्रजीत सिंह मालवीय को औपचारिक रूप से खुली ‘हरी झंडी’ नहीं दी है।
ऐसे में संत समाज के मंच से मिले वक्तव्य को क्या राजनीतिक पुनर्वास का नैतिक कवच माना जाए?
राजनीति में यह सवाल गूंज रहा है—
क्या अब धर्म और संतों की स्वीकार्यता सत्ता में वापसी का रास्ता बनती जा रही है?
⚔️ वागड़ की सियासत: पद, प्रतिष्ठा और पंचायत चुनाव
बांसवाड़ा–वागड़ क्षेत्र में यह कोई छिपा सच नहीं है कि महेंद्रजीत सिंह मालवीय और अर्जुन बामनिया के बीच तालमेल हमेशा सहज नहीं रहा।
दोनों पर आरोप लगते रहे हैं कि
जनरल सीटों को आपसी संतुलन से साधा गया,
जबकि जिला प्रमुख की सीट आरक्षित थी,
लेकिन उप जिला प्रमुख की सीट को लेकर सत्ता की बिसात बिछाई गई।
अब पंचायत चुनावों की आहट के साथ यह पुराना टकराव फिर उभरता दिख रहा है।
🔍 निष्कर्ष: तिलक नहीं, सत्य कसौटी है
संत अच्युतानंद महाराज की बात अपने आप में गहरी थी—
धर्म दिखावे में नहीं, आचरण में होता है।
लेकिन राजनीति में यही बात उलटे सवाल खड़े कर रही है।
आज जनता पूछ रही है—
स्वाभिमान विचार में होता है या पद में?
धर्म आस्था का विषय है या राजनीतिक प्रवेश का औजार?
और क्या बार-बार दल बदलना सिद्धांत है या सुविधा?
✍️ **फैसला संतों को नहीं,
अब जनता को करना है।**

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