पत्र जारी, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी अनभिज्ञ—समग्र शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली कटघरे में
बांसवाड़ा।
समग्र शिक्षा विभाग बांसवाड़ा द्वारा CDEO के पूर्व अधिकारी से जुड़े कथित गोलमाल की जांच के लिए जारी आदेश अब खुद विवादों में घिर गया है। मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी (समग्र शिक्षा) द्वारा पत्र क्रमांक 85/व/23-1 दिनांक 2026 से गठित जांच समिति को “शीघ्र जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने” के निर्देश तो दिए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इसके उलट नजर आ रही है।
आदेश पर हस्ताक्षरकर्ता राजेंद्र कुमार चौबीसा द्वारा सीबीईओ अरथुना माया सैमसन, उच्च माध्यमिक विद्यालय निचला-घंटाला के प्रधानाचार्य रोशन जोशी तथा पृथ्वीगंज विद्यालय के प्रधानाचार्य लोकेश शाह को जांच समिति में शामिल किया गया। सवाल यह है कि क्या यह समिति वास्तव में जांच करने की स्थिति में है?
अधीनस्थ से उच्च अधिकारी की जांच—नियमों की अनदेखी
प्रशासनिक व्यवस्था में यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी उच्च पदस्थ अधिकारी की जांच उसके अधीनस्थ से नहीं कराई जाती। बावजूद इसके, इसी श्रेणी के अधिकारियों को जांच सौंपे जाने से निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकार इसे नियमों की खुली अनदेखी मान रहे हैं।
समिति प्रमुख को ही आदेश की जानकारी नहीं
हैरत की बात यह है कि समिति की नामित अध्यक्ष माया सैमसन का कहना है कि उन्हें अब तक जांच संबंधी कोई आधिकारिक आदेश प्राप्त नहीं हुआ। डिजिटल और व्हाट्सएप आधारित दौर में “लेटर नहीं मिला” जैसी स्थिति विभागीय तालमेल की पोल खोलती है।
पहले ही असमर्थता जता चुके प्रधानाचार्य
पृथ्वीगंज विद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. शाह ने 28 तारीख को लिखित में स्पष्ट कर दिया था कि वे जांच कार्य में शामिल नहीं हो सकते। इसके बावजूद उनका नाम समिति में बनाए रखना यह संकेत देता है कि आदेश जारी करने से पहले तथ्यात्मक स्थिति का आकलन ही नहीं किया गया।
ट्रेनिंग पर भेजे गए जांच अधिकारी
स्थिति तब और संदिग्ध हो जाती है जब यह सामने आता है कि 2 तारीख को निर्वाचन अधिकारी द्वारा दोनों नामित जांच अधिकारियों को दो दिन के प्रशिक्षण हेतु जयपुर भेज दिया गया। ऐसे में “तत्काल रिपोर्ट” की बात महज औपचारिकता प्रतीत होती है।
क्या यह सिर्फ कागजी कार्रवाई है?
पूरे घटनाक्रम से यह सवाल उभर रहा है कि कहीं यह जांच केवल आरटीआई कार्यकर्ता के दबाव को शांत करने के लिए तो नहीं?
क्या जांच रिपोर्ट वास्तव में तैयार होगी और सार्वजनिक की जाएगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा?
जवाबदेही तय करने की जरूरत
यह प्रकरण समग्र शिक्षा विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अब शिक्षा जगत और आमजन की निगाहें इस पर टिकी हैं कि विभाग निष्पक्ष, स्वतंत्र और नियमसम्मत जांच कराकर सच्चाई सामने लाएगा या फिर यह आदेश भी महज कागजों तक सीमित रह जाएगा।

