भामाशाह प्रकरण: बिना प्रमाणपत्र हुआ वेरिफिकेशन! पूर्व प्रधानाचार्य का बड़ा खुलासा

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भामाशाह प्रकरण: बिना प्रमाणपत्र हुआ वेरिफिकेशन! पूर्व प्रधानाचार्य का बड़ा खुलासा
बांसवाड़ा। चंद्र पोल विद्यालय में भामाशाह उपलब्धियों को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। विद्यालय की पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. चंद्रिका शर्मा ने साफ़ कहा है कि 24 जुलाई 2024 तक उन्होंने किसी भी शिक्षक या व्यक्ति को ऐसा कोई प्रमाणपत्र जारी नहीं किया कि उन्होंने विद्यालय में भामाशाह लाने में सहयोग किया हो।
डॉ. शर्मा ने हमारे संवाददाता से बातचीत में कहा —
“मैंने इस संबंध में किसी को भी कोई सर्टिफिकेट नहीं दिया। यह स्पष्ट तौर पर झूठ फैलाया जा रहा है। सच जानने के लिए विद्यालय के जावक रजिस्टर की जांच की जाए। उसमें दर्ज होगा कि किन दस्तावेज़ों को भेजा गया और किन पर मेरे हस्ताक्षर हैं।”
प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया क्या है?
सामान्यतः विद्यालय स्तर पर यदि किसी शिक्षक या व्यक्ति को भामाशाह या अन्य सहयोग संबंधी कार्यों के लिए प्रमाणित किया जाता है, तो इसकी औपचारिक प्रक्रिया होती है—
प्रधानाचार्य की संस्तुति और हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र।
विद्यालय की मुहर और जावक रजिस्टर में प्रविष्टि।
दस्तावेज़ की प्रति शिक्षा विभाग को भेजी जाती है।
विभागीय स्तर पर उसकी पुष्टि (वेरिफिकेशन) के बाद ही आगे की कार्यवाही होती है।
लेकिन इस प्रकरण में मुख्य बिंदु यह है कि जब प्रधानाचार्य ने कोई प्रमाणपत्र जारी ही नहीं किया, तो वेरिफिकेशन किस आधार पर हुआ?
सवालों के घेरे में वेरिफिकेशन
क्या विभागीय अधिकारियों ने दबाव बनाकर फर्जी हस्ताक्षर करवाए?
क्या वर्तमान कार्यरत अधिकारी दबाव में आकर गलत तरीके से दस्तावेज़ों को प्रमाणित कर बैठे?
क्या पूरी प्रक्रिया बिना आधार दस्तावेज़ों के ही पूरी कर ली गई?
जावक रजिस्टर ही खोलेगा राज़

पूर्व प्रधानाचार्य डॉ चंद्रिका शर्मा कहना है कि जावक रजिस्टर की जांच सबसे महत्वपूर्ण है।
यदि उसमें ऐसे दस्तावेज़ दर्ज ही नहीं हैं, तो यह साफ़ प्रमाण होगा कि संपूर्ण वेरिफिकेशन प्रक्रिया फर्जी आधार पर हुई है।
विभाग की चुप्पी पर भी सवाल

अब तक शिक्षा विभाग ने इस गंभीर मुद्दे पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है। यह मामला केवल एक प्रमाणपत्र का नहीं, बल्कि पूरी सम्मान और पुरस्कार प्रक्रिया की पारदर्शिता व ईमानदारी से जुड़ा है।
यदि झूठे दस्तावेज़ों के आधार पर शिक्षकों को सम्मानित किया जा रहा है तो यह न केवल ईमानदार शिक्षकों का अपमान है, बल्कि शिक्षा विभाग की साख पर भी सीधा सवाल है।
जनता का सवाल
क्या शिक्षा विभाग इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करेगा?
क्या जावक रजिस्टर खोलकर जिम्मेदारी तय की जाएगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा?

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