वंदे गंगा अभियान बना सवालों के घेरे में, ‘जल सेवा’ के नाम पर लाखों के बिल उठाने की तैयारी?
बांसवाड़ा। एक ओर पूरा शहर पीले और बदबूदार पानी की समस्या से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) द्वारा “वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान” के नाम पर शहर में जगह-जगह मिनरल वाटर कैंपर लगाकर “जल सेवा” का प्रदर्शन किया जा रहा है। अब यह पूरा मामला जनसेवा से ज्यादा सरकारी खर्च और संभावित भ्रष्टाचार को लेकर चर्चाओं में आ गया है।
शहरवासियों का कहना है कि जिन घरों में नलों से गंदा, बदबूदार और पीला पानी आ रहा है, वहां विभाग पहले आमजन को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी निभाए। लेकिन विभाग एक दिन के लिए वाटर बॉक्स और कैंपर लगाकर यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि शहर में सब कुछ सामान्य है।
मौके पर लगाए गए कैंपरों पर साफ तौर पर “वरुण वाटर सप्लायर्स” का नाम लिखा हुआ दिखाई दे रहा है। यानी पानी और कैंपर निजी सप्लायर द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जबकि पूरे आयोजन को विभागीय अभियान के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर यह “जनसेवा” है या फिर “बिल सेवा”?
जानकारी के अनुसार शहर में करीब 20 पानी के कैंपर लगाए गए हैं। अब लोगों के बीच चर्चा इस बात की है कि इन कैंपरों और पानी सप्लाई के नाम पर आखिर कितना भुगतान उठाया जाएगा। आशंका जताई जा रही है कि सेवा और प्रचार के नाम पर लाखों रुपए के बिल सरकारी खजाने से पास किए जा सकते हैं।
उठ रहे हैं कई गंभीर सवाल
क्या इन कैंपों के लिए नियम अनुसार टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई?
निजी सप्लायर “वरुण वाटर” का चयन किस आधार पर किया गया?
क्या PHED के पास स्वयं की जल सेवा व्यवस्था नहीं थी?
जब शहर में आम जनता को दूषित पानी मिल रहा है तो विभाग पहले स्थायी समाधान क्यों नहीं कर रहा?
क्या एक दिन के जल सेवा कैंप से शहर की असल जल समस्या छिपाई जा सकती है?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि वास्तव में विभाग जनता के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर होता तो सबसे पहले शहर की जल पाइपलाइन, फिल्टर व्यवस्था और पेयजल गुणवत्ता सुधारने पर काम करता। लेकिन यहां स्थिति उलटी दिखाई दे रही है — आमजन को गंदा पानी और अभियान में मिनरल वाटर!
सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा है कि अभियान में हुए खर्च, सप्लायर चयन, भुगतान प्रक्रिया और स्वीकृत बजट की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि “जल सेवा” के नाम पर किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता या भ्रष्टाचार सामने आ सके।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में पारदर्शिता दिखाता है या फिर “वंदे गंगा” अभियान केवल फोटो और प्रचार तक सीमित रह जाएगा।
शहर में बदबूदार पीला पानी, लेकिन अभियान में ‘मिनरल वाटर’ की सेवा!”
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