बदलती राजनीति के चेहरे: आरोपों से आलिंगन तक का सफर

pnpandey

भारतीय राजनीति में स्थायी यदि कुछ है, तो वह है—परिवर्तन। कभी मंचों से एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाने वाले नेता समय के साथ एक ही मंच साझा करते दिखाई देते हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों ऐसा ही एक दृश्य चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां वर्ष 2016 में भ्रष्टाचार के आरोपों के केंद्र में रहे नेता आज उसी राजनीतिक दल के प्रमुख चेहरों के साथ मुस्कुराते नजर आ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों और पुराने भाषणों के वीडियो ने राजनीतिक स्मृतियों को फिर ताजा कर दिया है। वर्ष 2016 में चुनावी माहौल के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi ने पश्चिम बंगाल के प्रभावशाली नेता Suvendu Adhikari सहित कई नेताओं पर भ्रष्टाचार और घोटालों को लेकर खुलकर हमला बोला था। उस समय भाजपा विपक्ष की भूमिका में थी और बंगाल में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही थी। भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति भाजपा के सबसे बड़े हथियारों में शामिल थी।
लेकिन राजनीति की धारा कब और कैसे बदल जाए, इसका अनुमान लगाना कठिन है। समय बीता, राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और वही शुभेंदु अधिकारी भाजपा का हिस्सा बन गए। आज वे पश्चिम बंगाल में भाजपा के सबसे बड़े चेहरों में गिने जाते हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर लोग पुराने भाषणों और वर्तमान तस्वीरों को जोड़कर सवाल पूछ रहे हैं कि क्या राजनीति में आरोप केवल चुनावी हथियार बनकर रह गए हैं?
यह सवाल केवल एक व्यक्ति या एक दल तक सीमित नहीं है। भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहां कल तक एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले नेता बाद में सत्ता और रणनीति के कारण साथ आ गए। कभी “भ्रष्टाचार” का मुद्दा उठाने वाले दल बाद में उन्हीं नेताओं को “जनप्रिय” और “विकासवादी” बताने लगते हैं। यही स्थिति विपक्षी दलों में भी देखने को मिलती है।
असल मुद्दा यह है कि जनता राजनीति को अब केवल भाषणों से नहीं, बल्कि डिजिटल रिकॉर्ड और पुरानी वीडियो क्लिप्स से भी परख रही है। सोशल मीडिया ने नेताओं के पुराने बयान हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिए हैं। ऐसे में जब पुराने आरोपों के बावजूद राजनीतिक गठजोड़ बनते हैं, तो आम नागरिक के मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या सिद्धांत और नैतिकता वास्तव में राजनीति में पीछे छूट चुके हैं?
राजनीति में विचारधारा और रणनीति दोनों का महत्व होता है। दल बदलना या नए राजनीतिक समीकरण बनना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन जब वही नेता जिन पर गंभीर आरोप लगाए गए हों, बाद में सम्मान के साथ उसी दल में शामिल कर लिए जाएं, तो राजनीतिक विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल केवल चुनावी मंचों पर आरोप लगाने तक सीमित न रहें, बल्कि यदि किसी व्यक्ति पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाते हैं, तो उन आरोपों पर पारदर्शी जांच और स्पष्ट निष्कर्ष भी सामने आएं। अन्यथा जनता के बीच यह संदेश जाता है कि आरोप केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम हैं, सिद्धांत नहीं।
लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ी निर्णायक होती है। वह सब देखती है, सुनती है और समय आने पर अपना फैसला भी देती है। इसलिए राजनीतिक दलों और नेताओं को यह समझना होगा कि बदलते समय में जनता की स्मृति पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है। आज का मतदाता केवल नारों से नहीं, बल्कि नेताओं के पुराने और नए दोनों चेहरों से राजनीति को आंक रहा है।

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