“79वां स्वतंत्रता दिवस — परंपराओं का ‘रिवीजन’, मेहरबानी का सिलसिला, सीट ड्रामा और चापलूसी का कवरेज!”
बांसवाड़ा से खास रिपोर्ट
79वां स्वतंत्रता दिवस… लेकिन नज़ारे पुराने!
जिला स्तरीय कार्यक्रम में वही चेहरे, वही खेल और वही मेहरबानियां।
माइक संचालन—फिर ब्रजमोहन ‘तूफान’ के कब्ज़े में। रिटायरमेंट के बाद भी सीट पक्की, नए लोगों के लिए दरवाज़ा बंद।
आकाशवाणी की पूर्व उद्घोषिका महिला एवं बाल विकास की पर्यवेक्षक नमिता कुलश्रेष्ठ को देखते हुए लगता है किअब वारिस तैयार करने का ख्याल आया—प्रेरणा उपाध्याय को थमा दी माइक की ट्रेनिंग।
सम्मान की लिस्ट भी हुई ‘ओवरलोड’—पहले 30-35 नाम, अब 61! कानाफूसी में तंज़—“पैसा दो, इनाम लो।”
उदाहरण भी मौजूद—एक महिला को सिर्फ इसलिए सम्मान कि दिल्ली में NCCकी ड्रेस का इंतज़ाम कर दिया था।
कल तक तहसीलदार का आदेश था—कोई भी स्कूल मंच के सामने बैंड नहीं बजाएगा।
लेकिन… मेहरबानी के लिए नियम बदल गए।
एक स्कूल को मिला 17 मिनट 48 सेकंड का पूरा मंच-प्रदर्शन टाइम, बाकी को सिर्फ गुज़रने का हुक्म।
और नामी स्कूल का वही पुराना ‘हमेशा टॉपर’ फॉर्मूला—बैंड हो, झांकी हो, परेड हो या सम्मान लिस्ट—पहला और दूसरा स्थान इन्हीं का! बाकियों के लिए बस तालियां।
लोग मज़ाक में कहने लगे—“अगर इस स्कूल का नाम पहले न आए, तो समझिए कार्यक्रम किसी और ग्रह पर हुआ होगा।”
सीट ड्रामा भी कम दिलचस्प नहीं रहा—जिला अध्यक्ष पूंजीलाल गायरी विधायक की कुर्सी पर जा बैठे, जबकि उनके लिए आरक्षित कुर्सी खाली पड़ी रही। इसे ‘VIP कुर्सी प्रेम’ कहें या ‘राजनीतिक सेल्फी मोमेंट’, दर्शक अपनी राय खुद बना लें।
कवरेज की बात करें तो आकाशवाणी के धीरेंद्र कुमार शाक्य सालों से आते हैं और उनके स्थान पर कोई दूसरा चेहरा भेजने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं की गई। वहीं लोकल चैनल की उद्घोषणा भी प्रेरणा उपाध्याय और बृजमोहन तूफान मंच से बड़े गर्व से करते हैं—“मान्यवर, यह कार्यक्रम इतने बजे चैनल पर और इतने बजे फेसबुक पर दिखाई देगा।”
दूसरे पत्रकार और मीडिया कर्मी भी वहां कवरेज कर रहे थे, लेकिन उनका ज़िक्र तक नहीं। लगता है यहां भी वही नियम चलता है—“जो चापलूसी करेगा, उसका नाम उद्घोषणा में चमकेगा।”
NCC कैडेट्स—जो अनुशासन और देशभक्ति की मिसाल होते हैं—उनकी मेहनत और भागीदारी को भी वो अहमियत नहीं मिली, जिसकी वे हकदार थे। मंच पर ‘VIP मेहरबानियों’ का बोलबाला रहा, जबकि NCC के कई कैडेट किनारे खड़े रह गए।
शिक्षा विभाग में भी भेदभाव खुलकर दिखा—कुछ ब्लॉकों के शिक्षकों और संस्थाओं को भर-भर के सम्मान मिले, जबकि बाकी ब्लॉकों को पूरी तरह नज़रअंदाज कर दिया गया।
ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों की चुप्पी भी सवाल खड़े करती है—क्या ये चुप्पी प्रशासनिक दबाव है या फिर ‘सिस्टम’ में फिट हो जाने की मजबूरी?
बांसवाड़ा का 79वां स्वतंत्रता दिवस—खट्टी-मीठी यादों के साथ यह साबित कर गया…
कि यहाँ बदलाव सिर्फ झंडे की ऊँचाई में होता है, सोच की ऊँचाई में नहीं।

